15 की उम्र में छोड़ा घर, 9 सालों से माता-पिता से नहीं मिला, 10-10 रुपये को मोहताज खिलाड़ी ने टीम को बनाया चैंपियन

मध्य प्रदेश ने रणजी ट्रॉफी फाइनल में इतिहास रचा. मुंबई को हराकर उसने पहली बार इस खिताब को अपने नाम किया. मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक जीत में कई लोगों का अहम योगदान रहा. कोच चंद्रकांत पंडित को इसका सबसे ज्यादा श्रेय मिल रहा है लेकिन एक खिलाड़ी ऐसा भी है जिसने मध्य प्रदेश की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है. बात हो रही है बाएं हाथ के स्पिनर कुमार कार्तिकेय (Kumar Kartikeya) की जिन्होंने रणजी ट्रॉफी में मध्य प्रदेश के लिए सबसे ज्यादा 32 विकेट हासिल किए. बाएं हाथ के इस स्पिनर ने शम्स मुलानी के बाद सबसे ज्यादा शिकार किए. कार्तिकेय ने तीन मैचों में पारी में पांच विकेट झटके. कुमार कार्तिकेय के टैलेंट को अब दुनिया सलाम कर रही है. अर्श पर पहुंचे इस खिलाड़ी ने कामयाबी के लिए काफी दुख और दर्द झेले हैं. आइए आपको बताते हैं कार्तिकेय सिंह की कहानी जो आपको कामयाबी के लिए प्रेरित करेगी.

9 सालों से घर नहीं गए कुमार कार्तिकेय

मध्य प्रदेश का ये बाएं हाथ का स्पिनर यूपी के सुल्तानपुर के रहने वाले हैं. कार्तिकेय के पिता यूपी पुलिस में हैं और इस खिलाड़ी ने पिछले 9 साल से अपने परिजनों से मुलाकात नहीं की है. आपको जानकर हैरानी होगी कि कार्तिकेय ने महज 15 साल की उम्र में घर छोड़ दिया था. कार्तिकेय ने अपनी मां और पिता को कहा था कि जब वो कुछ बन जाएंगे तभी अपनी शक्ल दिखाएंगे. कुमार कार्तिकेय ने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में बताया, ‘9 साल, 2 महीने और तीन दिन हो चुके हैं मैंने अपने माता-पिता से मुलाकात नहीं की है. अब मुझे 20-25 दिन का ब्रेक मिलेगा तो ही मैं उनके पास घर जाऊंगा.’

कार्तिकेय ने क्यों छोड़ा था घर?

कार्तिकेय सिंह ने यूपी की अंडर-16 टीम में सेलेक्ट नहीं होने की वजह से घर और परिवार छोड़ दिया था. कार्तिकेय सिंह के पिता श्यामनाथ सिंह ने बताया, ‘मैं पिता हूं खुद की भावनाएं रोक सकता हूं लेकिन उसकी मां बहुत भावुक रहती है. वो बस हमें फोन करता है. हम कार्तिकेय का इंतजार कर रहे हैं. कार्तिकेय ने यूपी की अंडर-16 टीम में चयन नहीं होने के बाद घर छोड़ा था. उसने वादा किया था कि वो घर तभी लौटेगा जब क्रिकेट में उसका नाम होगा.’

कार्तिकेय ने टायर फैक्ट्री में किया काम

कार्तिकेय सिंह ने यूपी से दिल्ली की ओर कूच की और वो पेट पालने के लिए एक टायर फैक्ट्री में काम करने लगे. कार्तिकेय रात की शिफ्ट करते थे और 10 रुपये बचाने के लिए वो मीलों पैदल चलते थे. एक साल तक कार्तिकेय ने दिन का खाना नहीं खाया. दिल्ली में कार्तिकेय का दोस्त राधे उन्हें गौतम गंभीर के कोच संजय भारद्वाज के पास ले गए, जहां नेट्स पर पहली गेंद फेंकते ही वो इस खिलाड़ी की काबिलियत को भांप गए.

 

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संजय भारद्वाज की क्रिकेट एकेडमी दिल्ली के अशोक विहार में है और कार्तिकेय सिंह गाजियाबाद रहते थे. कार्तिकेय सिंह रोज एकेडमी में ट्रेनिंग के लिए 32 किमी. का सफर तय करते थे. दिल्ली क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद उन्हें रणजी टीम में जगह नहीं मिली जिसके बाद संजय भारद्वाज ने साल 2017 में इस खिलाड़ी को शाहडोल क्रिकेट एसोसिएशन से मिलवाया. कार्तिकेय ने 2018 में डेब्यू किया और अब ये खिलाड़ी अपनी छाप छोड़ रहा है.

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